पावर हाउस फुँक गया, शास्त्री जी बेचैन ।चर्चा-चरखा कस चले, कैसे बीते रैन ।कैसे बीते रैन, तपस्या हो ना खंडित ।आकुल निकसे बैन, ढूंढ़ के लाओ पंडित ।ट्रांसफार्मर ठीक, कराये क्यूश्चन आवर ।होवे चर्चा नीक, बढे शब्दों का पावर ।।शुक्रवार को दस हुई, रचना थी छब्बीस ।शनिवार को फिर लगा, यहाँ निपोरे खीस।यहाँ निपोरे खीस, बीस की आशा लेकर ।पाकर गुरु आशीष, चढ़ावा पूरा देकर ।कर रविकर अनुरोध, समझ लो मित्र सार को । आगे बढिए रोज, छोडिये शुक्रवार को ।।प्रिय पाठक-गण !!यह पहेली हल करें और कुंडलियों में छुपे कम से कम एक ब्लाग का नाम अपनी टिप्पणी में लिखें ।।बसंत ऋतू की शुभकामनाएं...आइये कुछ झलकियां तो देख लीजिए मित्र मेरे ब्लाग में बसंत पंचमी की...प्रस्तुति : शास्त्री जी की ओर से (शायद 20 टिप्पणियां मिल ही जाएँ) बसंत ऋतु आई है .... डा श्याम गुप्त..... ----क्यों मिलता फिर बिछड़ता कोई ----इस बसंत के मौसम में क्यों ...----टिब्बी (हनुमान गढ़)में फ्री प्राक्रतिक चिकित्सा सेमिनार ----घुघूतीबासूतीकौन वसन्त? कौन वसन्त कैसा वसन्त किसका वसन्त? किसीका ड्राइवर नौकर या कुक? या फिर सोसायटी का कोई वॉचमेन? देखा नहीं, सुना नहीं यह नाम!...परदेश में किसी अपने को फूल भेजने हैं? ----नाम की क्या फिकर तुझको.....----शुक्र है..शुक्रवार है..#33ये ज़िंदगी है-क्या-जाने, वो-जिसने जी-ही-नहीं, उसे क्या होश का पता है, जिसने पी ही नहीं, जो चहते हो जानना, के क्या है मय का असर, तो परिंदे से पूछ लो, है क्या..."अब चमन, अपना ठिकाना हो गया है" *दिल हमारा अब दिवाना हो गया है।*** *फिर शुरू मिलना-मिलाना हो गया है।।*** *हाथ लेकर चल** ** पड़े हम साथ में**,* *प्रीत का मौसम**, **सुहाना हो गया है।*** ...रविकर जी!साइबर कैफे में जाकर कुछ लिंक और जोड़े हैं।अब शायद 20 से अधिक कमेंट तो आ ही जायेंगे।
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